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क्या आप भी जानना चाहते हैं कि क्यों मनाया जाता है रक्षाबंधन? अगर आप भी हमारी तरह रक्षाबंधन के बारे में और जानना चाहते हैं तो आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं। हमने इस आर्टिकल में रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है और यह परंपरा कब से है सब बताया है। हम यह तो जानते है कि रक्षा बंधन भाइयों और बहनों का त्योहार है, यह भी के यह बंधन एक डोर से उन्हें बांधती है। पर हम इस बात से वंचित है के इसके और भी भाव है जो रक्षा बंधन की कहानियों से पता चलता है। इतिहास के पन्नों से हमे मिलते है यह सारे जवाब। अगर आप और भी जानना चाहते हैं तो फिर बने रहें हमारे साथ और पढ़ें इस आर्टिकल को।

रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का पावन पर्व है, जो उन्हें एक पवित्र डोर में बाँधता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उन भावनाओं का उत्सव है जो दूरी, समय और परिस्थितियों से कहीं अधिक मजबूत होती हैं। चाहे भाई-बहन दुनिया के किसी भी कोने में हों, रक्षाबंधन का यह अवसर उन्हें भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के करीब ले ही आता है। आज भले ही जीवन की व्यस्तताओं या दूरियों के कारण वे साथ न हों, लेकिन बहनों की राखी समय पर भाइयों तक पहुँच जाती है और भाइयों की ओर से भेजे गए उपहार इस रिश्ते की मिठास को और भी गहरा कर देते हैं।

रक्षाबंधन केवल राखी बाँधने और उपहारों के आदान-प्रदान का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, संरक्षण और शुभकामनाओं का उत्सव भी है। इस पर्व से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएँ, ऐतिहासिक प्रसंग और लोककथाएँ हमें इसके वास्तविक महत्व से परिचित कराती हैं। इन कथाओं के माध्यम से हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि भाई राखी बंधवाते समय अपनी बहन की रक्षा, सम्मान और साथ निभाने का संकल्प क्यों लेता है, और बहन अपने भाई के सुख, समृद्धि, दीर्घायु तथा मंगलमय जीवन की कामना क्यों करती है।

इन किंवदंतियों और परंपराओं से यह भी स्पष्ट होता है कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वास, कर्तव्य, आत्मीयता और पारिवारिक मूल्यों का भी प्रतीक है। यही कारण है कि यह पर्व सदियों से भारतीय संस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।

आख़िर रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है? इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई? इसके पीछे कौन-सी पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कथाएं जुड़ीं हैं? यदि आपके मन में भी ऐसे प्रश्न हैं, तो यह लेख आपके लिए है। इसमें हमने रक्षाबंधन के इतिहास, उत्पत्ति, महत्व, धार्मिक मान्यताओं और इससे जुड़ी प्रमुख कथाओं को प्रमाणिक स्रोतों के आधार पर सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, ताकि इस पावन पर्व से जुड़े आपके सभी प्रश्नों के उत्तर एक ही स्थान पर मिल सकें।

रक्षा बंधन का आरम्भ

कहा जाता है कि रक्षा बंधन का आरम्भ इंद्र देव की पत्नी ने किया था। भविष्य पुराण के अनुसार, इंद्र की पत्नी शची ने पहली बार इंद्र को रक्षा सूत्र बांधा था। उन्होंने इंद्र देव को युद्ध में जाने से पहले यह रक्षा सूत्र बांधा था, ताकि वह उसकी रक्षा कर सके। उस समय रक्षा सूत्र रक्षा के उद्देश्य से बांधा गया था, और आज भी उसका यह मान्यता है। बस रिश्ता बदल गया है, पर रक्षा सूत्र का अटूट बंधन और रक्षा का वादा नहीं बदले हैं।

मान्यता है कि उस समय इस रक्षा सूत्र ने इंद्र देव की रक्षा की थी। आज भी राखी को भाई की रक्षा, सुख-समृद्धि और मंगल कामना का प्रतीक माना जाता है। इतिहास और पौराणिक परंपराओं में ऐसी अनेक अन्य कथाएँ भी मिलती हैं, जो इस भावना को व्यक्त करती हैं। आइए, ऐसी ही कुछ और कहानियों को जानें और समझें कि हम रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं तथा इस पर्व का क्या महत्व है।

रक्षा बंधन मनाने का कारण और महत्व

रक्षा बंधन क्यों मनाते है

भाई और बहन का रिश्ता बहुत ही अनोखा होता है। और इस अनोखे रिश्ते को अटूट करता है रक्षाबंधन। इस त्यौहार की लीला तो हमने महाकाव्य महाभारत में भी सुनी है। और उसके साथ ही साथ इतिहास के पन्नों में इस त्यौहार का गुणगान हमें मिलता है। लेकिन सबसे पहले यह जान लो कि हम क्यों और किस तरह मनाते हैं रक्षाबंधन। अब तक हमें यह तो पता चला है कि सबसे पहली राखी शची, इंद्र देव की पत्नी ने बाँधी थी। और यही इस परंपरा की शुरुआत हुई थी। यह दिवस श्रावण के पवित्र महीने में मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में पूर्णिमा को सबसे शुभ माना जाता है। तो श्रावण के महीने की पूर्णिमा को रक्षा बंधन मनाया जाता है। यह तिथि सुबह मिलते ही पूर्णिमा के शुरू होते ही तिथि अनुसार बहनें सारी तैयारियाँ शुरू कर देती हैं। पूजा की थाली, राखी, फूल और मिठाई। बहनें इस विश्वास के साथ अपने भाइयों को राखी बाँधती हैं कि यह रक्षा बंधन उनकी रक्षा कवच की तरह रक्षा करेगा। बहनें आरती उतारती हैं और भाइयों का मुख भी मीठा कराती हैं, जो कि उनका प्यार और आशीर्वाद बताते हैं। बहनें यह प्रण लेती हैं और अपने भाई की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं। जबकि भाई यह संकल्प लेते हैं कि वह अपनी बहनों की रक्षा करेंगे और किसी भी विपरीत परिस्थिति में सहायता करेंगे। यह बंधन भाइयों और बहनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें सिर्फ करीब ही नहीं लाता, पर एक-दूसरे के प्रति स्नेह भी बताने का अवसर देता है। रक्षाबंधन हमें बताता है कि भाई और बहन का प्रेम सबसे अनोखा होता है। यह बंधन सिर्फ अटूट ही नहीं, पौराणिक और शक्तिशाली है जो कि किसी भी बला को भाई-बहनों को छूने नहीं देती। यह हम इतिहास के पन्नों से जान सकते हैं, तो आइए जानें कैसे।

राखी का प्रतीकात्मक महत्व

रक्षा बंधन क्यों मनाते है

राखी केवल एक रंगीन धागा नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सुरक्षा और अटूट रिश्ते का प्रतीक है। यह भाई-बहनों के बीच स्नेह, सम्मान और आजीवन साथ निभाने के वचन को दर्शाता है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर बाँधी गई राखी उसकी सुख, समृद्धि, दीर्घायु और मंगल की कामना का प्रतीक होती है, वहीं भाई अपनी बहन की रक्षा, सम्मान और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने का संकल्प लेता है।

धार्मिक दृष्टि से राखी को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, जो केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, शुभता और ईश्वर के आशीर्वाद का भी प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि रक्षाबंधन का यह पवित्र धागा पारिवारिक प्रेम, कर्तव्य, विश्वास और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक बन गया है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रक्षाबंधन का उत्सव

रक्षाबंधन पूरे भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है, लेकिन इसकी परंपराएँ, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक स्वरूप हर क्षेत्र में अलग-अलग दिखाई देते हैं। कहीं यह भाई-बहन के प्रेम का उत्सव है, कहीं धार्मिक अनुष्ठानों का, तो कहीं सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर। यही विविधता रक्षाबंधन को भारतीय संस्कृति के सबसे समृद्ध त्योहारों में से एक बनाती है।

उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब)

उत्तर भारत में रक्षाबंधन पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बड़े उत्साह से मनाया जाता है। बहनें भाई के माथे पर तिलक लगाकर राखी बाँधती हैं, आरती उतारती हैं और उसकी सुख-समृद्धि एवं दीर्घायु की कामना करती हैं। भाई उपहार देकर बहन की रक्षा और सम्मान का वचन देता है। यह दिन परिवारों के पुनर्मिलन और पारिवारिक उत्सव का अवसर भी होता है।

राजस्थान

राजस्थान में रक्षाबंधन राजस्थानी परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यहाँ रामराखी भगवान को अर्पित की जाती है, जबकि लूंबा राखी विवाहित भाइयों की पत्नियों (भाभियों) के चूड़े में बाँधी जाती है। यह परंपरा पूरे परिवार की खुशहाली और एकता का प्रतीक मानी जाती है।

गुजरात

गुजरात में रक्षाबंधन धार्मिक आस्था और पारिवारिक उल्लास का संगम है। भाई-बहन के पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ कई परिवार भगवान कृष्ण के मंदिरों में दर्शन करते हैं। घरों में पारंपरिक मिठाइयों के साथ इस पर्व का उत्सव मनाया जाता है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में रक्षाबंधन नारळी पूर्णिमा के साथ मनाया जाता है। समुद्र तटीय क्षेत्रों में मछुआरा समुदाय समुद्र देवता वरुण की पूजा कर सुरक्षित और समृद्ध जीवन की कामना करता है, जबकि परिवारों में बहनें भाइयों को राखी बाँधकर उनके मंगल की प्रार्थना करती हैं।

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते के साथ-साथ सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा आरंभ किए गए राखी उत्सव की परंपरा आज भी कई स्थानों पर भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द के संदेश के साथ मनाई जाती है।

बिहार और झारखंड

बिहार और झारखंड में रक्षाबंधन धार्मिक श्रद्धा और पारिवारिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। पूजा-अर्चना, राखी बाँधना और पारंपरिक मिठाइयों के साथ परिवार एकत्र होकर इस पर्व का आनंद लेते हैं।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़

इन राज्यों में रक्षाबंधन पारिवारिक उत्सव के साथ प्रकृति और कृषि से भी जुड़ा हुआ है। कई स्थानों पर लोग पेड़ों और कृषि उपकरणों को भी रक्षा सूत्र बाँधकर समृद्धि और संरक्षण की कामना करते हैं।

हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश में रक्षाबंधन स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा और पारिवारिक अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है। कई क्षेत्रों में लोग मंदिरों में दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

दक्षिण भारत

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में श्रावण पूर्णिमा के दिन उपाकर्म (अवनि अवित्तम) का विशेष महत्व है। हालांकि आज महानगरों और कई परिवारों में भाई-बहन के बीच राखी बाँधने की परंपरा भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

नेपाल

नेपाल में रक्षाबंधन जनै पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन ब्राह्मण नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं और पुजारी श्रद्धालुओं की कलाई पर दोरो (रक्षा सूत्र) बाँधते हैं। साथ ही बहनें अपने भाइयों को राखी बाँधकर उनके सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं।

रक्षा बंधन का इतिहास

रक्षाबंधन का महत्व केवल धार्मिक ग्रंथों तक ही सीमित नहीं रहा। महाभारत, पुराणों और भारतीय लोकपरंपराओं में श्रीकृष्ण और द्रौपदी, यमराज और यमुना, तथा राजा बलि और देवी लक्ष्मी जैसी अनेक कथाएँ इस पर्व की महत्ता को और अधिक समृद्ध बनाती हैं। इसके अतिरिक्त, मध्यकाल में रानी कर्णावती और हुमायूँ की कथा तथा 1905 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा बंगाल विभाजन के विरोध में आयोजित राखी उत्सव ने रक्षाबंधन को सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक बना दिया।

ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना

रवीन्द्रनाथ टैगोर और भारत विभाजन की कहानी

जब अंग्रेज़ों के हाथों भारत विभाजित हो रहा था, 1905 में, बंगाल के प्रिय कवि रवीन्द्रनाथ ने बंगाल से अनुरोध किया कि सब इस विभाजन को रोकने के लिए राखी बाँधेंगे। हुगली नदी के किनारे सारे बंगाली और मुसलमान भाइयों और बहनों ने राखी मनाई। एकत्रित होते हुए उन्होंने एक-दूसरे को राखी बाँधी और इस विभाजन का विरोध किया। इस किस्से से रवीन्द्रनाथ भारतीयों की भ्रातृत्व भावना का प्रदर्शन करना चाहते थे। 1911 में भारत विभाजन ख़ारिज किया गया। उसका सटीक कारण तो अनजान रहा, पर रवीन्द्रनाथ के आग्रह से यह साबित हो गया था कि भारतीय विभाजन के विपक्ष में थे। बंगाल में यह घटना रक्षाबंधन को सामाजिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है।

ऐतिहासिक संदर्भ

  • Banglapedia – Partition of Bengal, 1905.
  • यह बताता है कि 1905 में लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बंगाल के विभाजन के विरोध में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया और अपने गीतों एवं जन-अभियानों के माध्यम से बंगाली एकता का संदेश दिया।
  • The Indian Express – "Tagore's 'Banglar Mati, Banglar Jol'"
  • इस लेख में विस्तार से बताया गया है कि टैगोर ने 1905 के बंगाल विभाजन का विरोध किया, 'Banglar Mati, Banglar Jol' गीत लिखा और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में राखी बंधन उत्सव का आयोजन किया।
  • इस स्रोत के अनुसार, 16 अक्टूबर 1905 को विभाजन लागू होने के दिन रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लोगों से एक-दूसरे को राखी बाँधने का आह्वान किया, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बंगाल की एकता धर्म से ऊपर है।

पुस्तकें

  • सुमित सरकार। बंगाल में स्वदेशी आंदोलन, 1903–1908। नई दिल्ली: परमानेंट ब्लैक (Permanent Black), 2010 (द्वितीय संस्करण)।
  • कृष्णा दत्ता एवं एंड्रयू रॉबिन्सन। रवीन्द्रनाथ टैगोर: द मायरियड-माइंडेड मैन (Rabindranath Tagore: The Myriad-Minded Man)। लंदन: ब्लूम्सबरी (Bloomsbury), 1995.
  • सव्यसाची भट्टाचार्य (संपादक)। महात्मा और कवि: गांधी और टैगोर के बीच पत्र एवं संवाद (The Mahatma and the Poet: Letters and Debates Between Gandhi and Tagore)। नई दिल्ली: नेशनल बुक ट्रस्ट (National Book Trust), 1997.

लोकप्रिय कथा

कृष्ण और द्रौपदी की कहानी

कृष्ण और द्रौपदी का संबंध भारतीय महाकाव्य महाभारत में मित्रता, श्रद्धा और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। यद्यपि महाभारत में कहीं भी यह स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को राखी बाँधी थी, फिर भी लोककथाओं और जनश्रुतियों में यह कथा व्यापक रूप से प्रचलित है और रक्षाबंधन के संदर्भ में सुनाई जाती है। कहा जाता है कि एक बार श्रीकृष्ण अपने सुदर्शन चक्र से आहत हुए थे। तो द्रौपदी जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से कपड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँधी थी। इस भाव को देख श्रीकृष्ण बहुत ही भावुक और प्रसन्न हुए। उन्होंने द्रौपदी जी को वचन दिया कि वह उनकी सदैव रक्षा करेंगे। और उन्होंने अपना वचन निभाया जब पांडव अपना सब कुछ देव पर हर गए थे और कौरव द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब उन्होंने द्रौपदी जी  के मान-सम्मान की सिर्फ रक्षा की। उन्होंने यह प्रण लिया था कि वे इस युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएँगे। लेकिन समय आने पर उन्होंने भीष्म पितामह का संकेत देते हुए अस्त्र उठाया, जिसने व्यक्त किया कि अगर कुछ अमान्य हो रहा हो तो एक व्यक्ति को अपना वचन भूल जाना चाहिए। इसी कारण यह कथा रक्षाबंधन के अवसर पर भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षा के प्रतीक के रूप में अक्सर सुनाई जाती है। गुजरात और द्वारका क्षेत्र में श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा रक्षाबंधन से जोड़कर सुनाई जाती है।

संदर्भ

प्राथमिक ग्रंथ

  • महाभारत, सभा पर्व (द्यूत क्रीड़ा एवं द्रौपदी चीरहरण प्रसंग)
  • महाभारत, सभा पर्व (शिशुपाल वध का प्रसंग)

विद्वत स्रोत

  • बिबेक देबरॉय (अनुवादक)। महाभारत (खंड 2)। नई दिल्ली: पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया, 2012।
  • जे. ए. बी. वैन ब्यूटेनन (अनुवादक)। महाभारत। शिकागो: यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो प्रेस।
  • अल्फ हिल्टेबाइटेल। महाभारत पर पुनर्विचार (Rethinking the Mahabharata)। शिकागो: यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो प्रेस, 2001।

कर्णावती और हुमायूँ की कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथाओं में मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूँ की कहानी का विशेष स्थान है। सन् 1535 ईस्वी में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर आक्रमण किया। उस समय मेवाड़ के शासक राणा सांगा का निधन हो चुका था और उनकी पत्नी रानी कर्णावती अपने छोटे पुत्र उदय सिंह की ओर से राज्य का संचालन कर रही थीं। बहादुर शाह की विशाल सेना के सामने मेवाड़ की स्थिति अत्यंत कठिन थी। मेवाड़ की रानी कर्णावती को जब बहादुर शाह के इरादे का पता चला तो उन्होंने संकट की इस घड़ी में रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को सहायता के लिए एक राखी भेजी। जिस राखी को हुमायूँ ने स्वीकार करते हुए उनकी सहायता की। पता चला रक्षा बंधन के वचन से रानी कर्णावती ने अपने राज्य को बचाया था। हुमायूँ के द्वारा रानी कर्णावती के प्रति दर्शाया यह भाव हमें राखी का सम्मान दर्शाता है। यह कथा रक्षाबंधन के संदेश—विश्वास, सम्मान और रक्षा—को सशक्त रूप से प्रस्तुत करती है। इसलिए आज भी इसे रक्षाबंधन के अवसर पर प्रेरणादायक प्रसंग के रूप में सुनाया जाता है। राजस्थान में रक्षाबंधन के साथ रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूँ की लोककथा विशेष रूप से सुनाई जाती है।

संदर्भ

प्राथमिक स्रोत

  • गुलबदन बेगम। हुमायूँनामा।
  • अबुल फ़ज़्ल। अकबरनामा।

आधुनिक विद्वत स्रोत

  • सतीश चंद्र। मध्यकालीन भारत (Medieval India)। नई दिल्ली: हर-आनंद पब्लिकेशन्स।
  • जॉन एफ. रिचर्ड्स। मुगल साम्राज्य (The Mughal Empire)। कैम्ब्रिज: कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1993।
  • आर. सी. मजूमदार (संपादक)। भारत के लोगों का इतिहास और संस्कृति (The History and Culture of the Indian People), खंड 7: द मुगल एम्पायर। भारतीय विद्या भवन।

पौराणिक कथा

पोरस और रोक्सेना की कहानी

पोरस और रोक्सेना (रौक्साना) की राखी से जुड़ी कहानी रक्षाबंधन के अवसर पर अक्सर सुनाई जाती है। इसके अनुसार, जब 326 ईसा पूर्व में सिकंदर (Alexander the Great) भारत पर आक्रमण करने आया, तो उसकी पत्नी रोक्सेना ने भारतीय परंपरा के अनुसार राजा पोरस (पुरु) को राखी भेजी और युद्ध में अपने पति का वध न करने का अनुरोध किया। कहा जाता है कि पोरस ने राखी का सम्मान करते हुए युद्ध में सिकंदर को नहीं मारा। अगर राजा पोरस को रोक्सेना ने राखी नहीं भेजी होती तो एलेक्ज़ेंडर के साथ उनका युद्ध रोके न रुकता। कहा जाता है कि पोरस एलेक्ज़ेंडर को जान से मार सकते थे, लेकिन उन्हें अपना दिया हुआ वचन याद आ गया। जिसके कारण उन्होंने एलेक्ज़ेंडर की हत्या नहीं की। एलेक्ज़ेंडर इस भ्रातृत्व भाव को देखकर अपनी पराजय स्वीकार करते हुए अपना राज्य उनके हाथ देकर चले जाते हैं। रक्षाबंधन से जुड़ी रोक्सेना द्वारा राखी भेजने की कहानी का उद्देश्य भाई-बहन के पवित्र बंधन, विश्वास और रक्षा के वचन की भावना को दर्शाना है। इसलिए आज यह कथा सांस्कृतिक दृष्टि से लोकप्रिय है।  

संदर्भ

प्राथमिक स्रोत

  • एरियन (Arrian) – अनाबासिस ऑफ़ अलेक्ज़ेंडर (Anabasis of Alexander)
  • प्लूटार्क (Plutarch) – लाइफ़ ऑफ़ अलेक्ज़ेंडर (Life of Alexander)
  • कर्टियस रूफस (Quintus Curtius Rufus) – हिस्ट्री ऑफ़ अलेक्ज़ेंडर (Histories of Alexander)

आधुनिक विद्वत स्रोत

  • ए. बी. बोसवर्थ (A. B. Bosworth)। Conquest and Empire: The Reign of Alexander the Great. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1988।
  • रॉबिन लेन फॉक्स (Robin Lane Fox)। Alexander the Great. पेंगुइन बुक्स, 1973।
  • रोमिला थापर। Early India: From the Origins to AD 1300. यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस, 2002।

राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पौराणिक कथा राजा बलि और देवी लक्ष्मी की है, जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में मिलता है। यह कथा भाई-बहन के रिश्ते से आगे बढ़कर विश्वास, स्नेह और रक्षा के बंधन का संदेश देती है।

पौराणिक कथा के अनुसार, असुरों के महान और दानवीर राजा महाबली (राजा बलि) ने अपने पराक्रम और यज्ञों के प्रभाव से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से दान में तीन पग भूमि माँगी। जैसे ही बलि ने वचन दिया, भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान न बचने पर राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया और वचन दिया कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे।

भगवान विष्णु के पाताल लोक में रहने से देवी लक्ष्मी चिंतित हो गईं। तब उन्होंने एक ब्राह्मण स्त्री का वेश धारण किया और राजा बलि के पास पहुँचीं। श्रावण पूर्णिमा के दिन उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा। राजा बलि ने उन्हें अपनी बहन स्वीकार किया और उनसे मनचाहा वर माँगने को कहा। तब देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से अपने साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति माँगी। राजा बलि ने अपनी बहन की इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को उनके साथ जाने की अनुमति दे दी।

इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि रक्षा सूत्र केवल जन्म से जुड़े भाई-बहन के रिश्ते का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि विश्वास, स्नेह, सम्मान और आत्मीय संबंधों का भी प्रतीक है। यही कारण है कि रक्षाबंधन का पर्व केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक बंधनों का भी उत्सव माना जाता है।

संदर्भ

प्राथमिक ग्रंथ

  • श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कंध (वामन अवतार और राजा बलि का प्रसंग)
  • विष्णु पुराण, प्रथम अंश (वामन अवतार)

विद्वत स्रोत

  • एच. एच. विल्सन (अनुवादक), विष्णु पुराण।
  • स्वामी तपस्यानन्द (अनुवादक), श्रीमद्भागवतम्, श्री रामकृष्ण मठ।
  • जे. एल. शास्त्री (संपादक), The Bhāgavata Purāṇa, मोतीलाल बनारसीदास।

यम और यमुना की कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ी एक और प्रसिद्ध पौराणिक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना की है। यमराज को मृत्यु, न्याय और धर्म का देवता माना जाता है। उन्हें धर्मराज भी कहा जाता है, क्योंकि वे मनुष्यों के कर्मों के अनुसार उन्हें न्याय और उनके कर्मों का फल प्रदान करते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, यमुना अपने भाई यमराज से अत्यंत स्नेह करती थीं। लंबे समय तक उनसे भेंट न होने के कारण उन्होंने अनेक बार अपने भाई को अपने घर आने का आग्रह किया। अंततः जब यमराज अपनी बहन से मिलने पहुँचे, तो यमुना ने उनका आदर-सत्कार किया, उनके मस्तक पर तिलक लगाया और उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा।

अपनी बहन के प्रेम और स्नेह से अभिभूत होकर यमराज ने उन्हें वरदान माँगने के लिए कहा। यमुना ने अपने लिए कुछ न माँगते हुए यह कामना की कि प्रत्येक भाई-बहन का स्नेह और साथ सदैव बना रहे। तब यमराज ने आशीर्वाद दिया कि जो भी बहन अपने भाई की कलाई पर श्रद्धा, प्रेम और मंगलकामना के साथ रक्षा सूत्र या राखी बाँधेगी, उसके भाई को सुख, समृद्धि, दीर्घायु और आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होगा।

इसी मान्यता के कारण रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम का ही नहीं, बल्कि दीर्घायु, सुरक्षा और शुभकामनाओं का भी प्रतीक माना जाता है। उत्तर प्रदेश, विशेषकर मथुरा और वृंदावन क्षेत्र में यमराज और उनकी बहन यमुना की कथा अत्यंत लोकप्रिय है।


संदर्भ

प्राथमिक स्रोत

  • भविष्य पुराण, ब्रह्म पर्व (रक्षाबंधन एवं यमुना-यमराज प्रसंग)
  • स्कन्द पुराण (यमुना महात्म्य से संबंधित उल्लेख)

विद्वत स्रोत

  • जी. पी. भट्ट (संपादक), The Bhaviṣya Purāṇa, मोतीलाल बनारसीदास।
  • जे. एल. शास्त्री (अनुवादक), The Skanda Purāṇa, मोतीलाल बनारसीदास।
  • आर. सी. हाजरा, Studies in the Puranic Records on Hindu Rites and Customs, मोतीलाल बनारसीदास।

यह कहानियाँ हमें यह बताती हैं कि रिश्ता एक परिवार से होने से नहीं बनता। वह बनता है स्नेह और प्रेम से जो हमें एक डोर से बाँधती है। यह डोर राखी की है जो हम चाहे कितनी भी दूर चले जाएँ, हमेशा याद दिलाएगी और एक-दूसरे से जुड़े रखेगी।

तो यह रक्षाबंधन की ताकत का पूर्वोदाहरण है, जो व्यक्त करता है कि कैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है। यह त्यौहार भाइयों और बहनों का है जो कि हमेशा से ही रक्षा का प्रतीक रहा है। इसी के कारण हम इस दिवस को रक्षाबंधन कहते हैं। चाहे जितने भी दूर रहें, बहनें अपने भाइयों के लिए राखी और तोहफे ज़रूर भेजती हैं। भाइयों के हाथ सूने नहीं रहते इस दिन और भाई भी कोई कमी नहीं छोड़ते तोहफों की बारिश करने में अपनी बहनों के ऊपर। यह त्यौहार ही है जो भाइयों और बहनों को एकत्र करता है और उनके इस अनोखे रिश्ते को कायम रखता है। तो अगर आप भी दूर हैं अपने भाई या बहन से तो फिर रुष्ट न हों और तोहफे और रक्षा ज़रूर भेजें गिफ्टिंग वेबसाइट से। जबकि अब हम सब जानते हैं क्यों मनाई जाती है राखी और क्या है इसका इतिहास। अब हम इस दिवस की गंभीरता को मद्देनज़र रखते हुए इस दिवस का अच्छे से पालन कर सकते हैं।

Marian has been a content writer for 3 years at GiftstoIndia24x7. Based in Kolkata, she crafts compelling articles, accurate product descriptions, and much more. She researches and writes articles that make finding the perfect gift for your loved ones easy. When she is not writing, she is seen researching, reading blogs, and books.
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